किस्सा कुर्सी का

व्यंग


गर्मी का दिन था हम अपने ओसारे में बैठे थे, तभी हमारा साथी रामखेलावन आया. आते ही बोला भैया जी एक व्यक्ति आपसे मिलने आया है। रामखेलावन जानता था हमारे बारे में कि छात्र जीवन से ही मैंने राजनीति में अपना कदम रख दिया था. अब मेरे बाल सफ़ेद हो चुके हैं, लेकिन अब तक सोने-चाँदी के सिक्कों की खनक से मैं दूर ही रहा.
       हाँ अब भी वक्त बेवक्त मैं उनकी मदद करता रहता जो मदद माँगने के लिए आता. किसी का बच्चा बीमार है, उसे अस्पताल में भर्ती कराना है. किसी के बच्चे को स्कूल में दाखिला दिलवाना है, किसी का ट्रान्सफर या पोस्टिंग करवाना है. कोई भी मदद माँगने आता था, मैं उनकी मदद कर दिया करता था. इसलिए यह सोच कर कि होगा कोई जरूरतमन्द, मैंने रामखेलावन को बोला उन सज्जन को लेकर आओ. उन सज्जन ने अपने आप को एक अरबपति बिजनेसमैन बताया, इतना सुनना था कि मैं बोला तो क्या आपको यहाँ अपना करोबार फैलाना है? इस पर हमारी सोच के विपरीत उन सज्जन ने कहा कि नही हमको अपना कारोबार नहीं फैलाना है. बल्कि हम यहाँ राजनीतिक पारी खेलने आये हैं. मैंने चौककर कहा- राजनीतिक पारी? तो उन सज्जन ने मेरी बात बीच में काटकर कहा- हाँ आपने ठीक सुना! यहाँ से हम अपनी राजनीति की पारी की शुरूआत करना चाहते हैं. सुना है आपकी राजनीति की गलियारों में अच्छी पकड़ है, आप अगर मेरी थोड़ी मदद कर देंगे तो मैं यहाँ से राजनीति की शुरूआत कर सकता हूँ। माल की चिंता आप न करें. जितना चाहेंगे उतना मिलेगा। मैंने उनकी बातों को बीच में काटते हुए पूछा- आप अपनी राजनीति की पारी कहाँ से शुरू करना चाहते हैं? इस बार भी उन सज्जन का जबाब चौंका देने वाला था. उन्होंने कहा- मैं यहाँ का मुख्यमंत्री बनना चाहता हूँ। मैंने बोरियत से भरी जम्हाई लेते हुए कहा- यह कैसे हो सकता है? उनका जवाब था. जब यहाँ राज्यसभा सदस्य बाहरी हो सकता है तो मुख्यमंत्री क्यों नही? मैं बोला- श्रीमान यहाँ भीतरी व्यक्ति ही मुख्यमंत्री बन सकता है, बाकी लोग नही। यहाँ बाहरी-भीतरी का झगड़ा है, तो उसने मुझे बताया कि आपने बिल्ली और बंदर का किस्सा नही सुना है बंदर ने किस बला की चालाकी से दोनों बिल्लियों की लड़ाई का फायदा उठाकर रोटी का टुकड़ा  हड़प लिया। हम भी यहाँ बाहरी-भीतरी झगड़ा का फायदा उठाकर मुख्यमंत्री पद हड़पना चाहता हूँ। आप अगर चाहेंगे तो यहाँ के विधायकों को मेरे पक्ष में खरीद सकते हैं। रूपयों की चिंता न करें। जितना चाहेंगे उतना मिलेगा। पचास करोड़, सौ करोड़, दो सौ करोड़ जितना बोलिए उतना दूँगा। आपको सिर्फ विधायकों को मैनेज  करना है। उसकी बातें सुनकर मेरे शरीर में मानो बिजली का करंट दौड़ने लगा. मैं भूल गया अपना उसूल अपना ईमान मैं यह भी भूल गया कि इस राज्य के लिये मेरे साथियों ने न जाने कितनी शहादत दी थी। मैं यह भी भूल गया कि राज्य के लिए मैंने भी अपनी जवानी कुर्बान कर दी थी। मैं यह सब भूलकर फोन से उन सभी विधायकों को जो मैनेज हो सकते थे दनादन फोन लगाने लगा, मैं सब कुछ भूल गया था यहाँ तक कि अपना जमीर भी. मेरे कानों मे सिर्फ और सिर्फ  गूँज रहा था पचास करोड़, सौ करोड़, दो सौ करोड़..

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