दोनों तरफ से चल रही थीं गोलियां; इसी में हजारों फीट ऊंची चोटियों पर चढ़कर साथियों को पहुंचाते थे खाना
कुंदन कुमार चौधरी, कारगिल की लड़ाई में सैकड़ों जवानों ने देश के खातिर अपनी जान कुर्बान की थी। झारखंड के दिगंबर दीक्षित और नागेश्वर महतो भी इसी लड़ाई में शहीद हुए थे। कई ऐसे भी रणबांकुरे हैं, जो इस लड़ाई में प्रत्यक्ष थे और अभी भी देश के लिए उनकी भुजाएं फड़क उठती हैं।
रांची के हेसाग में रहने वाले रोशन झा और बोकारो में रहने वाले उनके भाई सतीश झा दोनों आर्मी से जुड़े और दोनों की पहली पोस्टिंग कारगिल में ही हुई। कुशेश्वर झा के बड़े बेटे सतीश झा ने जनवरी में सिख रेजिमेंट में अपना योगदान दिया और छोटे बेटे रोशन झा ने जून में कॉर्प्स ऑफ सिग्नल्स के कम्यूनिकेशन डिपार्टमेंट में। दोनों ने छह महीने के आगे-पीछे आर्मी ज्वॉइन की। दोनों की पोस्टिंग द्रास सेक्टर में ही थी।
सम्मान... चोटियों पर शहीद हुए साथियों को कैंप में लेकर आता
आठवीं सिख रेजिमेंट में क्लर्क के पद पर सतीश झा द्रास सबसेक्टर कारगिल, जम्मू कश्मीर में तैनात थे। इनकी ड्यूटी चोटियों पर तैनात जवानों को खाना-पीना पहुंचाना था। इसके लिए वे गोलियाें की तड़तड़ाहट के बीच अपने साथियों के साथ 7 टीनों में खाद्य सामग्रियों को पैदल पीठ पर लादकर हजारों फीट ऊंची चोटियां चढ़ते थे और उन्हें खाना देते। जो जवान शहीद हो जाते, उनके पार्थिव शरीर को नीचे लाने का कार्य भी करते थे।
साहस... पाकिस्तान की गोलीबारी के बीच बड़े भाई से मिलने पहुंचा
रोशन झा फिलहाल झारखंड सरकार में सेवारत हैं। कहते हैं मेरा काम उधमपुर से लेकर लेह तक का करीब 600 किमी तक का कम्यूनिकेशन ठीक रखना था। भैया पंडरास में तैनात थे और मैं द्रास में। हफ्तों से भैया से नहीं मिला था। एक दिन उनसे मिलने निकल गया। बीच में वह क्षेत्र पाकिस्तान की सीमा के बिल्कुल पास था। चारों तरफ बम-गोले गिर रहे थे। मैं बचते-बचाते भैया के पास आखिर पहुंच ही गया।
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